मनविराम.
मनविराम
मैं झुकने लगी हूँ वैराग की तरफ
याद आती है कभी-कभी
उन बीते दिनों की..
जहाँ मैंने
अपने आप को देखा था
बहार के साथ झूमते हुए…
फूलों की महक में
कुछ अधूरी हँसी थी मेरी,
तितलियों की उड़ान में
एक अनकहा सपना भी था...
अब शांत हूँ,
ठहरी हुई,
जैसे कोई नदी तपस्विनी हो गई हो..
बहती तो है,
पर भीतर सबकुछ त्याग चुकी हो।
मन की शाखों पर
अब वसंत नहीं उतरता,
बस एक मौन छाया रहता है
जो कहता है —
"अब लौटना मत,
तू बहुत दूर आ चुकी है…"

अभी तो बहुत दूर तक जाना है....you are unstoppable...
ReplyDeleteJourney 👏👏👏👏
ReplyDeleteयह दुनिया कहने को तो अपनो का मेला हे,
ReplyDeleteध्यान सें देखो तो यहा हर शक्स अकेला हे...!!
Heartfelt feeling
ReplyDeleteह कविता बहुत ही सुंदर, गहराई से भरी और आत्मानुभूति की छाया लिए हुए है। तेजश्री शिंदे की यह अभिव्यक्ति एक भावनात्मक यात्रा है — बीत चुके उल्लास से लेकर वर्तमान वैराग्य तक।
ReplyDeleteThank you 😊
DeleteFelt like sitting in a garden after rain has stopped. Cool air, muddy rainy fragrance. Too Good mam.
ReplyDeleteThank you ma'am😊
Deleteभीतर सब कुछ त्याग चुकी
ReplyDeleteखुप छान
super 👌
ReplyDeleteKya baat hai dil ko choo gayi ❤️
ReplyDeleteThanks Di 😊
Deleteखूपच सुंदर
ReplyDeleteSo nice..
ReplyDeleteबहुत खूब लिखा है..... मन बहुत चंचल होता है इसका जवाब अपने दिया है हसी मजाक से ही जिंदगी अच्छी तरह से गुजरती है....
ReplyDeleteWow...that's awesome. Very deep and reflective ❤️❤️❤️
ReplyDeleteThanks Manju 😊
Deleteअतिसुंदर मस्त कविता आहे संयम हीच जीवनातील खरी परीक्षा आहे.
ReplyDeleteAatmvishwas la vadavnari hi kavita tumhi atishay sopya sabdane lihun khup chan lihlay ❤️🧿
ReplyDeleteखुप सुंदर, मनाच्या कोपऱ्यात दवाचा थेंब पडावा . आणि तो तसाच जपून ठेवावा आयुष्य इतकी नाजुक पण आयुष्याची खरी ओळख सांगणारी .
ReplyDeleteAwesome and Very painful 💐
ReplyDeleteमन बैरागी हो तो कोई ग़म नहीं
ReplyDeleteअतीत के सुनहरे पल तो संग हैं
एक जीवन का अंत ही तो
दूसरे जीवन का आरंभ हैं
यही दर्शानेवाली आपकी यह रचना हैं, तेजू..
अंतर्मुख करनेवाली.. सुंदर! 👌👌👌