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Showing posts from November, 2023

आठवणींचा दडलेला एक कप्पा म्हणजे...जुनं पुस्तक 📖

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  जुनं पुस्तक  धूळखात पडलेल्या जुन्या पुस्तकानं  आज डोकं वर काढलं अन्           इतक्या वर्षांच्या प्रवासानंतर           पुन्हा हातात येवून विसावलं..!         पहिल्याच पानावर तुझी अक्षर       त्यात रेंगाळत राहिली माझी बोटं    शोधत तुझा पहिला परिस स्पर्श     पुन्हा फुलून आलं अंग-अंग..!       पहिल्या प्रेमाची कथा अन्         कोवळ्या मनांच्या व्यथा सांगत     पुस्तकाच्या पानांत दडलेलं           गुलाबाचं फुल पुन्हा दरवळंल..!    धूळखात पडलेल्या जुन्या पुस्तकानं  आज डोकं वर काढलं..                                                      - तेजश्री शिंदे   

रातराणी.. नाजूक हळव्या भावनांची !

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  रातराणी गोड गुलाबी   यामी फुलते  रातराणी ती  गाली हसते  वाऱ्याला ही  भरते कापरे  रातगंध तव  बेभान पसरे  आकाशी चा  चंद्रही खुलला तिच्या यौवना तोही भुलला  अशी नाजूका शुभ्र कांतीची  जणू प्रेमिका  त्या रात्रीची  जणू प्रेमिका  त्या रात्रीची..                                 - तेजश्री शिंदे  - काही गोष्टी इतक्या नाजूक आणि सुंदर असतात की त्यांचा नुसता सहवास देखील सुखावतो. त्यांचे अस्तित्व आपले आयुष्य सुगंधीत करून जाते... या नाजूक फुलासारखी हळव्या मनाची अनेक नाती आपण आयुष्यभर कोणत्याही कारणाशिवाय अतिशय निःस्वार्थ भावनेने जपत रहातो. अशाच  खास व्यक्तींसाठी ही नाजूक, हळवी  कविता... रातराणी !

शब्दांचा खेळ सख्या.. (कविता)

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शब्दांचा खेळ सख्या.. का रे उगाचा हा, शब्दांचा खेळ सख्या भावनांनी जडलेला, उसना दे श्वास सख्या तुझ्या परिस स्पर्शाने, दरवळतो देह सख्या उमललेल्या त्या फुलास, भ्रमराचा ध्यास सख्या तुझ्या अबोल प्रितीला, इंद्रधनू पुल सख्या त्या गुलाबी रात्रींचा, जीवघेणा भास सख्या जाणीवांच्या गंधाने, दे स्मृतींना छेद सख्या स्वप्नांच्या दुनियेला, मोहरूपी कास सख्या का रे उगाचा हा, शब्दांचा खेळ सख्या                                                     - तेजश्री शिंदे  

कॅथॉरसिस..सुप्त विचारांची घुसळंण!

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  कॅथॉरसिस सहज निर्माण झालेली पोकळी  शोधत रहाते बंध-अनुबंध  का? कशासाठी? कुणास ठाऊक ते दोन शब्द सुद्धा उभारी देवून जातात, पण.. ती वेळ देखील येवू पहात नाही. आपण जखडत चाललो आहोत, प्रेमात; मोहात नि गुरफटून गेलोय स्वतःत, हे समजण्या पलीकडचे जग.. उलगडून पाहण्याचे धैर्य... कोठून आणू ? तुला समजावून सांगणे आता कठीण होऊन बसले आहे, शब्द थिटे पडत आहेत..अन् घसा कोरडा, हे अनोळखी शब्द कोडे  कधीच उलगडणार नाही का ? हा कॅथॉरसिस काय देवू पहात आहे?  ही घुसळंण थांबतच नाही  प्रश्नांवर उत्तरे शोधणे... हा प्रवास  आपल्या जिवंतपणाचे लक्षण  आपण सहप्रवासी या युगाचे  कि... युगा-युगान्तराचे  ही क्षण भंगुर पोकळी  दोन विचारांमधला उच्छ्वास...!                                                   - तेजश्री शिंदे 

बाकी है अभी..(कविता)

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  बाकी है अभी.. गुज़रे वक़्त का ख्याल ना किया कभी  हाँ.. मगर आँखो में पानी बाकी है अभी हमनें सवाल नहीं उठाए थे कभी  हाँ..पर कुछ जवाब मांगने बाकी है अभी हर पहलू को इतना ना टटोला कभी  हाँ..पर मेरी सोच पे चलना बाकी है अभी  हमनें शब्दों से दिल ना दुखाया कभी  हाँ..मगर खाली पन्नों पर लिखना बाकी है अभी  युँ तो ज़िंदगी को रुसवा ना किया कभी  हाँ..मगर मेरे हिस्से का जीना बाकी है अभी  हाँ..मेरे सब्र का इम्तिहान बाकी है अभी..                                                   - तेजश्री शिंदे 

चाहूल...निसटत्या क्षणांची!

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  चाहूल     पाठमोर्‍या तुला पाहून           वाटली होती द्याविशी हाक,    निसटत्या क्षणांना                 ओल्या किनाऱ्याची साथ..     हात तुझा हाती घेवून             टाकावी नात्याची जुनी कात,   उसळत्या भावनांना               थबकल्या पावलांची वाट..     तू माझा नसल्याची चाहूल       ही पहिल्या भेटीची खूणगाठ,    अजाणत्या जाणीवांना            उसन्या परतण्याची आस..      पाठमोर्‍या तुला पाहून           वाटली होती द्याविशी हाक..                                                        - तेजश्री शिंदे