तू... जो दर्पण के उस पार है
तू... जो दर्पण के उस पार है
तू, तेरी आंखें और ये दर्पण
मेरे जेहन मैं बसे हो इस कदर
के सोच ने दामन ओढ़ लिया है
और सपनों के आँगन में
फूल खिल रहे हैं... बेशुमार।
हर लम्हा तेरी आहट सा लगता है,
जैसे ख़ामोशी में भी तू कुछ कहता है।
तेरी मुस्कान की नमी अब
मेरे मौसमों में उतर आई है,
और हर शाम...
तेरी आंखों की तरह गहरी लगने लगी है।
ये जो दर्पण है न...
अब उसमें सिर्फ़ चेहरा नहीं दिखता,
तेरे जज़्बात, तेरे ख्वाब,
और कुछ अनकहे सवाल भी तैरते हैं।
कभी लगता है
मैं तुझमें गुम हो रही हूं,
या शायद...
तू ही मुझमें... कहीं घर कर गया है,
कहीं घर कर गया है।

Nice 👍(pritam)
ReplyDeleteVery deep.... profound
ReplyDeleteLovely 😍😍😍😍
ReplyDeleteक्या बात जहेन में... 👌👌
ReplyDelete1 number
ReplyDeleteये सिर्फ़ कविता नहीं, एक अनुभव था —
ReplyDeleteजैसे ख़ामोशी की भी आवाज़ होती है, और तुमने उसे शब्द दे दिए। बहुत खूब... ऐसे ही लिखते रहो... क्योंकि खामोशी को हर कोई अल्फाजों मैं नहीं पिरो सकता।
Thank you 😊
Delete❤️
ReplyDeleteExcellent poetry maam 👌
ReplyDeleteतुम्हारे हर शब्द की खूबसूरती बहुत खूब है..
ReplyDelete🌿💞
बस एक बार पढकर हम मुस्करा गये..!!
जीवन का सारा सार इसमे दिखाई देता हैं
🌿💞
Thank you sir 🙏
DeleteBahut umda...
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteफार सुंदर, द
ReplyDeleteकिती सुंदर रचना आहे ही... तेजू तुझा स्वभाव जितका बोलका, गोड आणि निखळ आहे...तुझ्या कविता तितक्याच अबोल, गूढ, तात्विक असतात...त्यांना समजून घेण्यासाठी त्या सतत वाचाव्या लागतात. या कवितेतील प्रत्येक लाइन गूढ प्रेमाची ग्वाही देतात.. तो प्रत्यक्षात सोबत नसला तरी जिकडे पहावे तो तिकडे दिसतो...दर्पण हे प्रेमाचे प्रतीक किती अचूक वापरले आहेस.. त्याचे डोळे, त्याचा अबोला, त्याचे हसणे... मितभाषी तो आणि बोलकी तू असावी...शेवटी काय तर त्याने तिच्या मनात स्वतःसाठी एक हक्काची जागा तयार केली आहे... तो सोबत नसला तरी ठायी ठायी पसरला आहे. कुपितल्या अत्तरासारखा...!
ReplyDeleteअतिशय समर्पक प्रतिक्रिया...!😊🙏
Deleteमोहब्बत का इज़हार इससे बेहतर नहीं हो सकता! मोहब्बत की तफ़सील इससे बेहतर अल्फाजों में नहीं हो सकती!
ReplyDeleteहम हमारे नहीं होते जब आप साथ होते हों
शायद इस दिवानगी को लोग मोहब्बत कहते हैं
बेहतरीन अदायगी तेजू! 👌🤝🙌
मनापासून धन्यवाद मंगेश 😍🙏
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