उजाले का बँटवारा.. एक गहरा एहसान!

 

उजाले का बँटवारा


सबके सिर पर एक ही सूरज उगता है,

पर सबके माथे की लकीरों में उजाला नहीं भरता।


सबके आँगन में हवा चलती है,

पर कुछ घरों की खिड़कियाँ टूटी होती हैं,

हवा वहाँ धूल बनकर जाती है।


सबकी रातों में चाँद टहलता है,

पर कुछ नींदें भूख से उलझती हैं,

और चाँद वहाँ जली रोटी-सा लगता है।


बाज़ार में सबके लिए सब कुछ है,

किंतु थाल तक पहुँचने वाली रोटियाँ

कभी पहचान नहीं पातीं कि किसकी भूख सबसे गहरी है।


समय सबके पास आता है,

पर कुछ के लिए वह पंख बन जाता है,

और कुछ के लिए बेड़ियाँ।


सवाल यह नहीं कि सूरज किसका है,

सवाल यह है कि उजाला किसे मिलता है?

                                     

                                          - तेजश्री शिंदे ✍️

Comments

  1. Great...bahut khub ..
    Aage bhi aisi hi likhti raho yahi kamna.. beautiful ❤️

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  2. Wovvvvvv. Keep it up..what a script...

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  3. प्रत्येक मध्यम वर्गीयांची हीच कहाणी आहे.... अप्रतिम लेखन.... लिखाणातला जिवंतपणा तो हाच👌

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  4. Amazing maam
    Such deep words have a different place in heart.

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  5. Wow amazing lines👌

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  6. Truth of life

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  7. Superb ❤️💕💕💕💕👏👏👏

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  8. This is not just poetry; it is a gentle wake-up call, a compassionate critique, and a question that demands introspection. Salute to you for capturing such a complex social truth with such grace and clarity.🫶

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  9. बहुत खूब लेख है....

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