वक्त...(कविता)
वक्त
कलकल करता, जो भीतर ही भीतर बहता
तेरे सोच से परे गुजरा हुआ, मैं वो वक्त हुँ..
दूर मंदिरके घंटे की, किनकीनाहट सुनी तोह होगी
उस श्रद्धा से भरे मन की, मैं पावनता हुँ..
रेत को मुट्ठी मैं कैद कर, देखा तो जरूर होगा
हर पल हांथों से छूटनेवाला, मैं वो एहसास हुँ..
उलझनों मे सुलझती, प्रश्नों से घिरी हुई
हर एक उमड़ते उम्मीद की, मैं पहली किरण हुँ..
समर से उठती ज्वाला, जो नहीं जानती मुड़ना
उस धगधगते युद्ध का, मैं जीवनगान हुँ..
कलयुग के मायाजाल से, उभर न सका कोई
हर वक्त घिरे सवालों का, मैं एकमात्र जवाब हूँ..
मैं रंग हुँ , बादल हुँ,
खुशबु हुँ, संगीत हुँ
प्रेरणा हुँ, तपस्या हुँ
जीवन का हर एक पहलू हुँ..
मैं ...हर मोड़ पे तुम्हें मिलनेवाला तजुर्बा हुँ...!
- तेजश्री शिंदे

तेजा
ReplyDeleteअप्रतिम कविता
हिंदी मध्ये सुद्धा तू छान लिहितेस. मनाला भावणारे , वक्त काय आहे कसा आहे हे थोडक्यात पण सहज सुंदर पद्धतीने तू इथे मांडले आहेस. शब्द त्या त्या जागेवर अतिशय चपखल बसले आहेत. प्रत्येक शब्दाचा अर्थ सुद्धा लक्षात येतो आहे आणि एकूण च कविता परत परत वाचावी असे वाटते.
सौरभ
धन्यवाद सौरभ दा..😊
Deleteबहुत खूब!! Please follow this passion very religiously!! Would love to see many more!! 😊
ReplyDeleteThanks Mangesh
Deleteवक़्त कभी नहीं रुकता सदैव चलता रहता है.कभी खुशी दे जाता है, तो कभी दुःख. कभी परेशानी तो कभी सुकून .....
ReplyDeleteउलझनों मे सुलझती, प्रश्नों से घिरी हुई
हर एक उमड़ते उम्मीद की, मैं पहली किरण हुँ...(beautiful lines)💕
बहुत बढिया कविता..💗👏
Thanks Riya 😊
Deleteआपके और एक बेहतर प्रयास के लिये आपका बहोत अभिनंदन..
ReplyDeleteवक्त वही होता है, पर वक्त के हीसाब से उसका लेहजा बदलता है. उसका रंग रूप और गती बदलती है. वक्त के बहोत पेहलू है उनको एक अलग अंदाज से अपने अलफाज मे उतारा हैं. मानो एक एक आल्फाज को लेके उन को एक धागे मे पिरोके उसकी एक माला तैयार की है. ऐसी है ये आपकी वक्त कविता..
अपने वक्त के हर एक पेहलू को हर एक अंदाज को हर एक लेहजे को अलग अंदाज से जाहीर किया है. श्रद्धा भरे मन की पावनता, उम्मिद की किरण, हाथ से छूटने वाला ऐहसास, सवाल मे घिरा हुवा जवाब, ऐसे अलग अंदाज से आज तक किसी ने वक्त को शायद ही देखा होगा.
कविता का अंत की पंक्ती तो बहोत खास, हर मोड पे मिलने वाला तजूर्बा दिल को भा गया..
आपके वक्त को पढते आपके वक्त को समजते हुये वक्त कैसे गुजारा समझा नही, इस लिये वक्त का अभिप्राय देणे मे वक्त लगा. इसे वक्त का तकाजा समझ लेना...
खूप छान teju...
शुक्रिया अझहर..! अंदाजे बया भी एक तजुर्बा था..जो वक्त के साथ साथ आता गया। ज़िंदगी अपने ही अंदाज़ मैं हमे सिखाती रहती है। उस सीख को अगर सही तरीके से ले लो तोह ज़िंदगी गुलज़ार है।
Delete👌👌👌👌👍👍
ReplyDeleteThanks Suhas!
Delete