शोर.. जो अंदरूनी है और विचारों के साथ झगड रहा है।

                 

                 शोर....


समंदर की लहरें शोर मचा रही थी ।
और मैं किनारे बैठे विचारों के चपेट मैं आ चुकी थी ।

ये ख्याल भी अजीब थे मेरे,
उठती लहरों के साथ बदले जा रहें थे। 
न जाने उन्हें किन किनारों की तलाश थी,
जो दौड़ लगाए जा रहे थे। 

मन के आँगन में झांककर देखा तो था,
कई सपनें वहाँ बिखरे नज़र आए ।
लहरों की तरह मिटते नज़र आए। 

ए जिंदगी तेरी फलक पर हम अजनबी से थे,
यू रास्तों पर साथ चले तो ऐब नज़र आए।
कोई समझे यहा, तो कुछ हमें समझ आए। 
ये शोर अंदरूनी है या उठती लहरे क़हर ढाए। 

समंदर की लहरें शोर मचा रही थी ।
और मैं किनारे बैठे विचारों के चपेट मैं आ चुकी थी ।

                                           

                                                 - तेजश्री शिंदे 







 











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