इत्र... सौंधी खुशबू यादोंकी!
इत्र.. तेरी आगोश में खोकर हमने कई हसीन सपने बुन रखे थे, तेरी इत्र की खुशबू के साथ जो बेचैन किए जा रहे थे, मानो कुछ ही पल के साथी हो । यूंही कुछ वक़्त गुजरता गया और इत्र की सौंधी-सौंधी खुशबू के साथ हमारी यादे भी उड़ती चली गयी मानों किसीने पुराना लिबास उतारकर नया पहन लिया हो । हम कभी कभी कैद हो जाते है.. यादों में, पलों में, ख्वाहिशों में जो भूल जाते हैं... इन्सान है । लिबास तो बदलेगा.. आज नहीं तो कल फिर भी पतंगा होकर मर मिटने की जिद हमे मोहब्बत का एहसास दिलाती है । मानो प्यार समर्पण का दुसरा नाम हो ! - तेजश्री शिंदे ✍️