वक्त...(कविता)
वक्त कलकल करता, जो भीतर ही भीतर बहता तेरे सोच से परे गुजरा हुआ, मैं वो वक्त हुँ.. दूर मंदिरके घंटे की, किनकीनाहट सुनी तोह होगी उस श्रद्धा से भरे मन की, मैं पावनता हुँ.. रेत को मुट्ठी मैं कैद कर, देखा तो जरूर होगा हर पल हांथों से छूटनेवाला, मैं वो एहसास हुँ.. उलझनों मे सुलझती, प्रश्नों से घिरी हुई हर एक उमड़ते उम्मीद की, मैं पहली किरण हुँ.. समर से उठती ज्वाला, जो नहीं जानती मुड़ना उस धगधगते युद्ध का, मैं जीवनगान हुँ.. कलयुग के मायाजाल से, उभर न सका कोई हर वक्त घिरे सवालों का, मैं एकमात्र जवाब हूँ.. मैं रंग हुँ , बादल हुँ, खुशबु हुँ, संगीत हुँ प्रेरणा हुँ, तपस्या हुँ जीवन का हर एक पहलू हुँ.. मैं ...हर मोड़ पे तुम्हें मिलनेवाला तजुर्बा हुँ...! - तेजश्री शिंदे