तुख़्म-ए-इश्क़ (गझल)
तुख़्म-ए-इश्क़ आज हमने जाना मन की ज़हमत किसे कहते है, किसी अपने को अपना ना कहना अज़ाब-सा खलता है । बेताब दिल को तेरा इंतजार तो ज़रूर रेहता है, किसी वक्त वो पूरा मेरा था ये सोचना ख़्वाब-सा लगता है। तेरा मिलना तुझमें मिल जाने का सबब सा लगता है, तुख़्म-ए-इश्क़ का दिल मे जगना खल-सा लगता है। इश्क़ का आलम है 'तेज' सब्र-ओ-ताब सा लगता है, उम्र-ए-रफ़्ता सा हाल अब मेरे प्यार का लगता है..। - तेजश्री शिंदे