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तुख़्म-ए-इश्क़ (गझल)

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तुख़्म-ए-इश्क़  आज हमने जाना मन की ज़हमत किसे कहते है, किसी अपने को अपना ना कहना अज़ाब-सा खलता है । बेताब दिल को तेरा इंतजार तो ज़रूर रेहता है, किसी वक्त वो पूरा मेरा था ये सोचना ख़्वाब-सा लगता है।  तेरा मिलना तुझमें मिल जाने का सबब सा लगता है, तुख़्म-ए-इश्क़ का दिल मे जगना खल-सा लगता है। इश्क़ का आलम है 'तेज' सब्र-ओ-ताब सा लगता है, उम्र-ए-रफ़्ता सा हाल अब मेरे प्यार का लगता है..।                                                      - तेजश्री शिंदे 

मुक्तीचा मार्ग...(कविता)

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  मुक्तीचा मार्ग  मी चालत रहाते धर्माने सांगितलेला मुक्तीचा मार्ग तो ईश्वर चराचरात आहे व्याप्त.. वैराग्य आणि स्वार्थत्याग तेव्हाच होईल साध्य..  जेव्हा आपलाच भासमान 'मी' सुटत जाईल अंतरंगातून  सामान्य माणसाच्या भ्रामक समजुतीतून.. तेव्हाच तो कर्मयोगी होऊन चालू लागेल भक्तीचा मार्ग  तो करेल मार्गक्रमण करून ऐहिक गोष्टींचा त्याग.. राग, लोभ, मोह-माया, मत्सर जातील विरून.. एक नवी पहाट उगवेल उत्क्रांतीचा नवा शोध लावून.. होमोसेपियन सेपियन पासून माणूस नावाचा प्राणी  तयार होण्याची सुप्तावस्थेतील ही सूक्ष्म प्रक्रिया  शोधत धुंडाळत रहाते मुक्तीचा अलिप्त मार्ग...!                                                         - तेजश्री शिंदे