मनविराम.
मनविराम मैं झुकने लगी हूँ वैराग की तरफ याद आती है कभी-कभी उन बीते दिनों की.. जहाँ मैंने अपने आप को देखा था बहार के साथ झूमते हुए… फूलों की महक में कुछ अधूरी हँसी थी मेरी, तितलियों की उड़ान में एक अनकहा सपना भी था... अब शांत हूँ, ठहरी हुई, जैसे कोई नदी तपस्विनी हो गई हो.. बहती तो है, पर भीतर सबकुछ त्याग चुकी हो। मन की शाखों पर अब वसंत नहीं उतरता, बस एक मौन छाया रहता है जो कहता है — "अब लौटना मत, तू बहुत दूर आ चुकी है…" - तेजश्री शिंदे ✍️