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Showing posts from June, 2025

भूमिका (कविता)

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  भूमिका   आजकाल मी कोणतीही भूमिका घेत नाही. कारण प्रत्येक भूमिका एक ओळख मागते, आणि आता माझ्याकडे ओळखी उरलेल्या नाहीत. कधीकाळी मी "मी" होते.. गाभाऱ्यात उभ्या मूर्तीइतकी स्थिर, पण बाहेर चाललेल्या नाट्यगृहात ती मूर्तीही एक पात्रच ठरली… पाहता पाहता लक्षात आलं.. स्वतःचं अस्तित्व ही सुद्धा एक कल्पना होती, जशी वेळ ही केवळ घड्याळात दिसते, आणि "निर्णय" हे केवळ पूर्वसंस्कारांचं रांगणारं सावट. निर्णय माझे नव्हते, ते माझ्या श्वासांतून फक्त वाहिले. जणू एखाद्या पानावरून वारा वाहतो पण पान कधीच वाऱ्याचा स्रोत नसतो… आज मी निवडते निवड न करण्याचं स्वातंत्र्य. साक्ष होणं हीच माझी नवी भूमिका जिथे मी पात्र नाही, तर "दृश्य" आणि "द्रष्टा" यांच्यात पडलेला निवांत विराम आहे. मी कोण आहे? हा प्रश्नही आता थकला आहे. तोही आता प्रश्न नाही उरलेला.. फक्त एक शांतता आहे जिच्यात सर्व प्रश्न विलीन होतात. उरते फक्त एक अस्तित्व.. अदृश्य, अलिप्त, ना ‘मी’, ना ‘माझं’, फक्त असणं... एक निर्विकार साक्ष.                                   ...

तू... जो दर्पण के उस पार है

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 तू... जो दर्पण के उस पार है तू, तेरी आंखें और ये दर्पण मेरे जेहन मैं बसे हो इस कदर के सोच ने दामन ओढ़ लिया है और सपनों के आँगन में फूल खिल रहे हैं... बेशुमार। हर लम्हा तेरी आहट सा लगता है, जैसे ख़ामोशी में भी तू कुछ कहता है। तेरी मुस्कान की नमी अब मेरे मौसमों में उतर आई है, और हर शाम... तेरी आंखों की तरह गहरी लगने लगी है। ये जो दर्पण है न... अब उसमें सिर्फ़ चेहरा नहीं दिखता, तेरे जज़्बात, तेरे ख्वाब, और कुछ अनकहे सवाल भी तैरते हैं। कभी लगता है मैं तुझमें गुम हो रही हूं, या शायद... तू ही मुझमें... कहीं घर कर गया है, कहीं घर कर गया है।                                      -तेजश्री शिंदे ✍️

उजाले का बँटवारा.. एक गहरा एहसान!

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  उजाले का बँटवारा सबके सिर पर एक ही सूरज उगता है, पर सबके माथे की लकीरों में उजाला नहीं भरता। सबके आँगन में हवा चलती है, पर कुछ घरों की खिड़कियाँ टूटी होती हैं, हवा वहाँ धूल बनकर जाती है। सबकी रातों में चाँद टहलता है, पर कुछ नींदें भूख से उलझती हैं, और चाँद वहाँ जली रोटी-सा लगता है। बाज़ार में सबके लिए सब कुछ है, किंतु थाल तक पहुँचने वाली रोटियाँ कभी पहचान नहीं पातीं कि किसकी भूख सबसे गहरी है। समय सबके पास आता है, पर कुछ के लिए वह पंख बन जाता है, और कुछ के लिए बेड़ियाँ। सवाल यह नहीं कि सूरज किसका है, सवाल यह है कि उजाला किसे मिलता है?                                                                                 - तेजश्री शिंदे ✍️