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Showing posts from January, 2025

एहसास-ए-अहबाब ...(गझल)

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  एहसास-ए-अहबाब  न जाने कौन सी इबादत का असर हो तुम, इस सूनी दास्तां का खुशनुमा सफ़र हो तुम। हर ग़ज़ल की तहरीर में ढलता सुखन हो, दोस्ती के पार एक पाक ज़हन हो तुम। जिंदगी के हर तूफां में ठहराव जैसा, हर खुशी के पीछे खुदा का जवाब हो तुम। जो ग़म की चादर को चीर दे हंसी से, मेरे वजूद की सबसे ख़ूबसूरत वजह हो तुम। एहसास-ए-अल्फ़ाज़ यूँ बयां करती है 'तेज' रिश्तों में महकता अहबाब का गुल हो तुम।                                                                        - तेजश्री शिंदे ✍️                   रिश्तों में सब से खूबसूरत रिश्ता होता है दोस्ती का। यह ग़ज़ल दोस्ती के उस अनमोल एहसास को बयां करती है, जो जीवन में स्थिरता, खुशी, और सुकून का स्रोत बनता है। इसमें दोस्त को एक ऐसे शख्स के रूप में दिखाया गया है, जो ग़म और मुश्किलों के बीच भी मुस्कान और उम्मीद की किरण लेकर...

दर्पण..स्त्री के आभासी सौंदर्य का प्रतीक!

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  दर्पण   मैं हैरान हूँ ये सोचकर, जब भी उसने देखा खुद को, हमेशा औरों की नजर से देखा? कुछ और लंबे होते बाल, गालों पर होते गढ़े हुए ग़ार, उजला रंग, कमल जैसे नयन, सौंदर्य का मतलब क्या सिर्फ इनका होना है वरण? मानो यह संस्कृति कहती है, कि उसकी पहचान बस इतनी है, जो पुरुष मन की कल्पना में, पूर्णता का बिंब बने। ऐसा नहीं कि उसने खुद को ढाला नहीं इस सांचे में, हर बार बदलते आदर्शों के पीछे अपना वजूद तौलने की चाह में, खुद को खो देने का, दर्द भी सहा।  पर हर बार बदली सौंदर्य ने परिभाषा, हर बार उलझा उस संज्ञा का मर्म, और आज एकाएक हुआ उजागर दर्पण के उस पार का संसार। विचारों से जो है सुशोभित, स्वाभिमान से जो है आलोकित, निखरा उसका व्यक्तित्व, जब हाथों से छूटा आभास का दर्पण। उन बिखरे टुकड़ों में देखा उसने, मुखौटों का वह सामाजिक सत्य, जो सदियों से अधमरा होकर भी अपनी जड़ें जमाए बैठा था। स्त्री का सौंदर्य दर्पण में नहीं, उसकी सहनशीलता की चमक में है, उसके विचारों के विस्तृत क्षितिज में है, हर पीड़ा को पीकर उभरी मुस्कान में है। उसके कर्मों से बने एक नए युग के आकार में है। वह हर परिभाषा को चुनौती...

तरंगी....प्रेम की अनमोल अनुभूती..!

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    तरंगी                                   किनारे दर किनारे                                      गुमशुदा मोहब्बत को गुहार लगाती       मैं ढूंढ रही थी समय की चक्र का पहिया       जो कभी उलटा घुमताही नहीं...      तूने शहर बदला, बदली शहर की हवा      अब पहले जैसा यहां कुछ नहीं रहा      शरीर सासों की माँग नहीं करता       तेरा आना अब कोई इत्तफाक नहीं लगता...      उतरती धूप की पतझड़ हवा के झोंकों से       सूखे पत्तों को बिखेरती रही...और में       सिरहाने समुंदर का तकियाँ लिए सोती रही       मोसम बदलने के इंतजार में...      यहां का मोसम तरंगी       हर गली यहां की संकरी      ...