हिमालय...शून्य कि शांति मैं घुला!
हिमालय मैं सोच रही थी... कभी तो हम पहुँचें उस शिखर पर जहाँ आकाश और धरती का संगम होता है, जहाँ मौन की गहराइयों में अनसुनी धुनें बहती हैं। हिमालय की बर्फ में छुपे प्राचीन रहस्य जैसे, वैसे ही तुम्हारी आँखों में अनकही कथाएँ ठहरी हों... और मैं, तुम्हारी धड़कनों की गुफ़ा में ध्यानस्थ साधिका-सी, तलाशती रहूँ अनंत उत्तर। वहाँ... ना मैं रहूँ, ना तुम, बस एक अनाम प्रेम, जो मौन से भी परे शून्य की शांति में घुलकर स्वयं हिमालय बन जाए। -तेजश्री शिंदे ✍️