तुम, फिर मुझे मिलना जरूर..
तुम, फिर मुझे मिलना जरूर.. तुम आए, मिले और अब जा भी रहे हो ? सुनो.. तुम, फिर मुझे मिलना जरूर ! कोरे काग़ज़ पर लिखी कविता और संगीत में पिरोए शब्दों की तरह ख़ुशनुमा-सा इश्क़ का बादल बनकर तुम, फिर मुझे मिलना जरूर...! पंछियों की आजाद किलकिलाहट और इंद्रधनू की जगमगाती आभा की तरह इश्क़ का नया-सा रंग खिलाकर तुम, फिर मुझे मिलना जरूर...! उम्मीदों से खिलखिलाती सुबह और ओस की झिलमिलाती बूँदों की तरह इश्क़ का धुँधला-सा कोहरा बनकर तुम, फिर मुझे मिलना जरूर...! इठलाती नदी की बेकरारी और सुरज की चढ़ती लालिमा की तरह इश्क़ का गुमनाम-सा साहिल बनकर तुम, फिर मुझे मिलना जरूर...! मेरी आजाद रूह की झलक और तेरी आँखों की मुस्कान की तरह इश्क़ का मीठा-सा दर्द बनकर तुम, फिर मुझे मिलना जरूर...! सुनो... तुम, फिर मुझे मिलना जरूर...! - तेजश्री शिंदे